
बाबा के कंधे पर झपकी सी लगती है सॉरी ।
बहना के प्यारी बातों सी लगती है सॉरी ।
भइया के संग जागी रातों सी लगती है सॉरी ।
खेल खेल में कभी हसाती कभी रुलाती ।
दोनों हांथो से कान पकड़ कर जब वो बोले सॉरी ।
यारों के संग कभी कभी सिकवे और सिकायत में ।
मिटटी के घरौंदों सी लगती है सॉरी ।
रिश्तों की इस खीचा तनी में हर पल ।
दो दिलों के बीच जुड़ी डोर सी लगती है सॉरी ।
